ख़मोशियों में तमाशा अदा निकल्ती है
निगाह दिल से तिरे सुर्मह सा निकल्ती है
તારી ખામોશીમા પણ એક અદા નિકળે છે, જેમ કે સુરમો લગાવેલી આંખ દિલની આરપાર નિકળે છે.
फ़शार-ए तन्गी-ए ख़ल्वत से बन्ती है शब्नम
सबा जो ग़ुन्चे के पर्दे में जा निकल्ती है
न पूछ सीनह-ए `आशिक़ से आब-ए तेग़-ए निगाह
कि ज़ख़्म-ए रौज़न-ए दर से हवा निकल्ती है
ગુજરાતી અનુવાદ રાજીવ ગોહેલ દ્વારા
– ग़ालिब

October 2, 2008 at 3:54 PM
फ़शार-ए तन्गी-ए ख़ल्वत से बन्ती है शब्नम
सबा जो ग़ुन्चे के पर्दे में जा निकल्ती है
वाह….वहुत खूब…
October 2, 2008 at 7:43 PM
फ़शार-ए तन्गी-ए ख़ल्वत से बन्ती है शब्नम
सबा जो ग़ुन्चे के पर्दे में जा निकल्ती है
ગાલીબની ગઝલો વેષે તો શું લખીએ પણ તમારી પસંદગી સરસ છે
October 2, 2008 at 9:54 PM
कि ज़ख़्म-ए रौज़न-ए दर से हवा निकल्ती है
wah wah…
October 3, 2008 at 5:01 AM
ग़ालिबके तीनो शेर
वाह…
न पूछ सीनह-ए `आशिक़ से आब-ए तेग़-ए निगाह
कि ज़ख़्म-ए रौज़न-ए दर से हवा निकल्ती है
वाह…शुभान अल्लाह्
October 4, 2008 at 4:03 PM
really nice…!
October 6, 2008 at 12:03 AM
ક્યા બાત હૈ !